अकबर बीरबल की कहानियों का संग्रह

अकबर बीरबल की कहानियों का संग्रह  – स्वागत है आपका हमारे एक और ब्लॉग पोस्ट में इस ब्लॉग पोस्ट में हम राजा बीरबल ने किस तरह बादशाह अकबर के लिए  तानसेन के गुरु हरिदास  जो भगवान श्री कृष्ण के भक्त हैं और वह सिर्फ भगवान श्री कृष्ण के लिए ही गाती है और जिनके गाने को सुनकर पक्षियों और जानवर भी नाचते हैं

ऐसे थे हरिदास जो इंसानों के लिए नहीं जाते थे और वे बादशाह अकबर के लिए गाने के लिए मना कर दिया था, और राजा  बीरबल ने हरिदास को  अपने बुद्धि से किस प्रकार मनाया और उनसे गाना भी गवाया इसकी एक कहानी आपको बताएंगे साथ ही हम इस कहानी के माध्यम से एक से एक सीख भी प्राप्त करेंगे

अकबर बीरबल की कहानियों का संग्रह

हरिदास के मीठे बोल अकबर के नाम भाग 1

बादशाह जलालुद्दीन अकबर जो मुग़ल सल्तनत के  बादशाह थे, एक दिन बादशाह अकबर  सुबह को अपने परम मित्र बीरबल और  शाही राज गायक तानसेन के  साथ में फूलों के बगीचे में बैठकर  तानसेन द्वारा गाए रागों का आनंद ले रहे थे

तानसेन एक ऐसे गायब थे जो अपने  राग गीतों के लिए बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध थे और बादशाह जलालुद्दीन अकबर उनके  द्वारा गाए गीत सुनने के लिए हर दिन सुबह उनके साथ बगीचे में बैठते हैं

बादशाह अकबर ने जब तानसेन से ऐसा एक गीत पेश करने के लिए कहा जिसे सुनकर पक्षी अभी गाने लगे और सभी जानवर झूमने लगे  तभी तानसेन ने ऐसे गीत को गाने के लिए मना कर दिया

तानसेन का कहना है ऐसे गीत सिर्फ उनके गुरु ही गा सकते हैं क्योंकि इस पूरे संसार में ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है जो सिर्फ पक्षी और जानवरों को भी  अपने गीत से झूमने पर मजबूर कर दे

तानसेन के गुरु हरिदास जी एकमात्र ऐसे  है जो बादशाह अकबर को इस तरह के गीत सुना सकते हैं क्योंकि हरिदास एक ऐसे व्यक्तित्व है जो किसी भी इंसान के लिए गाने नहीं जाते थे हमेशा भगवान श्री कृष्ण के लिए गाने गाती है क्योंकि हरिदास भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त हैं और वे अपने इष्टदेव भगवान श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए गाते हैं

हम  सभी जानते हैं कि भगवान श्री कृष्ण  इंसानों में जानवरों में पक्षियों में और पेड़ पौधों में अपने आप को देखते हैं इसलिए तानसेन के गुरु हरिदास का मानना है कि वे जब कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण उनकी गीत को जो और इस वजह से उन्होंने तय किया कि वह सिर्फ इंसानों के लिए गाना नहीं गाएंगे 

हरिदास हमेशा श्री कृष्ण के सामने ही गाने गाते हैं और वह भी जब उनका मन हो क्योंकि हरिदास कभी भी नहीं चाहते कि कोई भी  अकेला एक इंसान उनके गानों को सुनें

बादशाह अकबर ने इस बात को  बहुत ही क्रोध में आ गए थे बादशाह अकबर का कहना है हरिदास मेरे राज्य में रहते हैं और उनको मेरे आदेश का पालन करना ही होगा मैं इस राज्य का बादशाह हूं और मेरे कहने का भी काम इस राज्य में होने होंगे और मैं चाहता हूं कि हरिदास मुझे अपनी मधुर आवाज सुनाएं अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो वह दंड के पात्र होंगे

 बादशाह अकबर की बात को सुनकर राजा बीरबल ने कहा कि हरिद्वार से एक संत है और आप ऐसे किसी एक संत को अपने द्वारा संरक्षित किए नियमों को बदलने के लिए मजबूर नहीं कर सकते ऐसा करना आपके शान के खिलाफ है आप एक महान राजा है और आपको अगर हरिदास का गाना सुनना है तो आपको उनसे जाकर विनम्र निवेदन करना होगा

राजा बीरबल की बातों को सुनकर बादशाह अकबर ने तानसेन से माफी मांगी और कहा हमें आप माफ कर दीजिए हमने आपके गुरु के बारे में ऐसा भला बुरा कहा तानसेन ने कहा मैं आपकी मन की शांति को समझ सकता हूं क्योंकि हर कोई इंसान जो इस संसार में रहता है  उसकी दिल से इच्छा होती है कि वह  हरिदास के गाने को सुने लेकिन कोई भी इतना खुश नसीब नहीं होता

राजा बीरबल ने बादशाह अकबर को हरिदास से मिलकर उनके मधुर गीत को सुनने की  अनुरोध करने के लिए कहा और राजा बीरबल की बात सुनकर बादशाह अकबर ने अगले ही शुभा हरिदास से मिलने  का ठीक किया

हरिदास के मीठे बोल अकबर के नाम भाग 2

बादशाह अकबर ने  बीरबल और  तानसेन के साथ जंगल की ओर  प्रस्थान किया  तानसेन के अनुसार उनके गुरु जंगल में अपनी पूरी जिंदगी विचार है उनका मानना है जंगल में भगवान के सबसे प्रिय और निष्पाप जीव रहते हैं जो समाज से दूर अपनी एक अलग ही जीवन जी रहे हैं और हरिदास ने अपना पूरा जीवन इन पशु-पक्षी और पेड़ों के साथ बिताना सही समझा

 हरिदास एक साधारण जीवनशैली जीने वाले इंसान है जो एक मामूली कुटिया में रहते हैं और अपनी आंगन में एक तुलसी का पेड़ लगा कर रखा है जिससे वह तुलसी का पत्ता तोड़कर भगवान श्री कृष्ण को चढ़ाते हैं और उनकी आराधना करते हैं

 बादशाह अकबर ने जंगल की ओर जाते समय देखा कि उसे जंगल  में पशु पक्षियों की संख्या उनके राज्य से भी ज्यादा है क्योंकि वहां पर भगवान श्री कृष्ण का वास है ऐसा हरिदास का मानना है हरिदास हमेशा ही पशु पक्षियों में अपनी गीत को सुनाते जिस वजह से इस जंगल के हर एक जीव बहुत ही खुश रहता है

 बादशाह अकबर ने इस प्रकार की मनमोहक  दृश्य को देखकर  हरिदास के गीत सुनने की इच्छा और भी ज्यादा तीव्र हो गई और राजा बीरबल से कहा कि आज आपकी बुद्धि की परीक्षा है आप हमें कुछ भी करके हरिदास के गीत सुनाने का सौभाग्य प्राप्त करवाना होगा

  एक समय ऐसा आया राजा बीरबल बादशाह अकबर और तानसेन तीनों हरिदास के कुटिया के सामने जाकर उपस्थित हुए और अपने रथ से उतरने के बाद तीनों हाथ जोड़कर हरिदास की कुटिया के बाहर खड़े हो गए

 हरिदास तभी भगवान श्री कृष्ण की पूजा कर रहे थे अपने पूजा को खत्म करने के बाद हरिदास जी बाहर निकले और उन्होंने देखा कि मुगल सल्तनत के बादशाह अकबर उनकी  कुटिया के सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए हैं हरिदास ने बादशाह अकबर का सम्मान करते हुए उन्हें अपने कुटिया के अंदर ले जाकर बैठने का स्थान दिया और कहा कि ‘’  बादशाह जलालुद्दीन अकबर में आपके राज्य में रहता हूं और आपकी बहुत ज्यादा सम्मान करता हूं यह मेरा सौभाग्य है कि आप मेरे कुटिया में पधारे’’

 बादशाह अकबर ने कहा ‘’ मैं खुद को बहुत ही ज्यादा सौभाग्यशाली मानता हूं कि मेरी राज्य में एक ऐसे पुरुष रहते हैं जो अपनी पूरी जिंदगी पक्षी पशु और मानव के नाम कर दिया है जो अपने गीत से चारों ओर खुशहाली बांट रहे हैं’’

 फिर हरिदास जी ने कहा कि’’ मैं किसी भी पशु पक्षी  तथा इंसानों के लिए नहीं गाता यह भगवान श्री कृष्ण की लीला है जो इन सभी में भगवान श्री कृष्ण का वास है और वही सभी के अंदर रहते हैं जिस वजह से तेज जब खुश होते हैं तभी इस प्रकार की लीला पशु-पक्षी और इंसानों के माध्यम से करवाते हैं’’

 बादशाह अकबर ने अपनी इच्छा को रोक नहीं पाए और हरिदास जी को अपने मधुर  गीतों को सुनाने के लिए अनुरोध करने लगे लेकिन हरिदास जी ने क्षमा मांगते हुए कहा ‘’ माफ कीजिए मैं आपके लिए  गाना नहीं गा सकता भगवान श्री कृष्ण का आदेश के  को छोड़कर मैं किसी का  आदेश नहीं सुनता’’

 बादशाह अकबर ने कहा ‘’मैं आपको आदेश नहीं कर रहा हूं यह मेरा अनुरोध है कि आप मेरे लिए एक गीत गा कर सुनाएं’’

 जब बादशाह अकबर ने इतने अनुरोध करने के बाद भी हरिदास अपनी बात पर डटे रहे तब बादशाह अकबर को क्रोध आया और वह वहां से निकलकर जाने लगे तभी राजा बीरबल  को एक युक्ति सूझी और उन्होंने तानसेन को कहा कि 

‘’आप ऐसा एक गीत गाइए  जिसे हरिदास जी ने आपको शिक्षा काल में सिखाया था और उस गीत को आप बहुत ही गलत तरीके से गई है ताकि हरिदास जी मजबूर हो जाए उस गीत को सही  सही से गाकर आपको दिखाने के लिए’’

हरिदास के मीठे बोल अकबर के नाम भाग 3

तानसेन  ने बीरबल द्वारा सुझाव युक्ति के ऊपर ध्यान देते हुए एक ऐसा राग छेड़ा जो तानसेन ने गुरु हरिदास से अपनी शिक्षा काल में सर्वप्रथम सीखा था और जो राग तानसेन ने अब तक बादशाह अकबर को भी नहीं सुनाया था 

क्योंकि यह एक ऐसा राज था जिसे गाने से बारिश हो जाती थी , पक्षियों गाने लगती थी, मोर नाचने लगते थे, और सूरज एक जगह रुक जाता था सभी को मिलाकर एक ऐसा दृश्य तैयार होता  जैसे लगता हो भगवान स्वयं धरती पर प्रकट हो गए हो

यह गाना हरिदास जी ने तानसेन के शिक्षा काल में उन्हें सिखाने के बाद कहा था कि ”यह गाना तुम सिर्फ भगवान श्री कृष्ण की आराधना करते हुए ही गाना किसी भी इंसान को यह गाना मत सुनाना”

गुरु हरिदास की बात के सम्मान रखते हुए तानसेन ने भी गाना कभी भी किसी को नहीं सुनाया और बीरबल के द्वारा  सुझाव उक्ति को मानते हुए तानसेन गुरु हरिदास के  सामने जाकर खड़े हो गए

और उसी  राग को गाने लगे लेकिन उसमें उन्होंने हर एक वाक्य को गलत गाया जिससे हरिदास जी बहुत ही ज्यादा क्रोधित हो गए और तानसेन को डांटने लगे 

आखिर में बीरबल के द्वारा  सोची गई युक्ति काम में आने लगी अंततः हरिदास  उससे राग को गाने के लिए मजबूर हो गए और तानसेन के साथ बैठकर राग को गाने लगे

हरिदास के मीठे बोल अकबर के नाम भाग 4

बादशाह अकबर एक ऐसे इंसान थे जो खुद की हर एक  बात रखते थे किसी को दिया गया वचन भी उनके लिए बहुत ज्यादा मायने रखता था और किसी को किया गया अनुरोध है अगर पूरी ना हो तो उन्हें बहुत ही ज्यादा दुख पहुंचता था

बादशाह अकबर ने अपने बचपन से लेकर जवानी तक और जवानी से लेकर बुढ़ापे तक कभी भी ऐसी इच्छा  नहीं रखी जो पुराना किया हो उन्होंने अपनी हर एक इच्छा को पूरा करने के लिए सभी प्रकार की साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल की

लेकिन  आज तानसेन के गुरु हरिदास जी के सामने बादशाह अकबर हार गए और  वे यह कहकर अफसोस करने लगे कि ‘’ काश मैं भी एक पक्षी अथवा पेड़ होता तो आज गुरु हरिदास जी के गाने को सुनने के लिए इतना ज्यादा तरसता नहीं’’

 बादशाह अकबर ऊपर वाले से अपने आप को अगले जन्म में पक्षी या पेड़ बनाने के लिए अनुरोध कर रहे थे तभी राजा बीरबल ने आकर बादशाह अकबर को  खुशखबरी दी कि आपकी यह मन की इच्छा इसी जन्म में पूरी होगी और अभी पूरी होने जा रही है

 बादशाह अकबर ने राजा बीरबल की इस बात को सुनकर फूले न समाए और  बहुत ही उत्सुकता के साथ  राजा बीरबल को पूछने लगे कि ऐसा क्या तुमने भी चलाई जिससे हरिदास जी मान गए, हम भी यह जानना चाहेंगे कि तुम्हारे बातों में ऐसी क्या जादू है जो  आज तक हम नहीं जान पाए

बीरबल ने कहा बादशाह अकबर मैंने किसी प्रकार का जादू अथवा मनमोहक बातें नहीं की बस एक गुरु और एक शिष्य के बीच फिर से ज्ञान की स्रोत वह ऐसा एक सुझाव तानसेन जी को दिया  जिस सुझाव की मदद से  अपने गुरु हरिदास को फिर से राग छेड़ने के लिए मजबूर कर दिया है और जिसका परिणाम आपको अभी देखने को मिलेगा

हरिदास के मीठे बोल अकबर के नाम भाग 5

दूसरी ओर हरिदास जी अपने शिष्य तानसेन को फिर से एक और ज्ञान का पाठ पढ़ाने के लिए जिस गाने को उनके शिष्य ने अधूरा सीखा है उसे फिर से नए रूप में सिखाने के लिए प्रस्तुत हुए और अपने गुरु के दायित्व को पूरा करने के लिए भगवान श्री कृष्ण  के लिए गाय जाने वाले राग को फिर से तानसेन के सामने प्रस्तुत करने के लिए  भगवान श्री कृष्ण से अनुरोध किया  और भगवान श्री कृष्ण का नाम लेते हुए उन्होंने उस राग को शुरू किया जिस राख का नाम था राग भैरवी,

 भैरवी राग को  गाने से पहले उन्होंने सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की और फिर उन्होंने उस रात को गाना शुरू किया कुछ ही देर में उस राग  भैरवी की इतनी तीव्र हो गई  एक ऐसा मनमोहक दृश्य सृष्टि हुआ जिसकी कल्पना किसने नहीं  किया

 बादशाह अकबर ने राग भैरवी को सुनते हुए देखा कि उनके चारों ओर पेड़ों में फिर से फूल खिलने लगे  सभी पक्षी  अपना उड़ना छोड़ कर एक डाल पर जाकर  बैठकर राग भैरवी  को सुन रहे हैं

 फूलों के पौधे जो मुरझा गए थे जिनमें बिल्कुल जान नहीं थी वह भी फिर से  खेलने लगी, उस दिन बादशाह ने  अपने जीवन के सबसे सुंदर बारिश को देखा जिस बारिश के बूंद में एक अलग ही सुगंध था ऐसे लग रहा है कि यह बारिश सीधा स्वर्ग से पाताल में आ रही हो

 उस दिन बादशाह अकबर ने एक गुरु और शिष्य के बीच के संबंध  का एक अलग ही रूप देखा जिसमें शिष्य और गुरु दोनों के मिश्रण से एक राग में इतनी ज्यादा जान आ गई थी जिसकी वजह से पूरी पृथ्वी झूम उठी थी

 बादशाह अकबर ने उस राग को अपने दिमाग में और मन में इस प्रकार बसा लिया था की जैसे वह अपने अंतिम काल तक उसे ही सुन पाएंगे और इस तरह बीरबल के द्वारा दिए सुझाव की मदद से तानसेन ने हरिदास से राग भैरवी गीत को  बादशाह अकबर के लिए हरिदास के माध्यम से प्रस्तुत करवाया और उस दिन बादशाह अकबर ने खुद को इस जहां का सबसे खुशनसीब इंसान महसूस किया

 

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