अकबर बीरबल की कहानियां इन हिंदी

अकबर बीरबल की कहानियां इन हिंदी – हमारे इस ब्लॉग पोस्ट में हम अकबर और बीरबल की एक ऐसी गाथा को बताने जा रहे हैं जिसमें अकबर को अपनी शान और राजगद्दी पर घमंड हो गया था |

और जिसकी वजह से उन्होंने संत महात्मा पुरुषों को अपने दरबार के सामने बैठने से मना कर दिया था और इस घमंड को दूर करने के लिए बीरबल ने एक ऐसी तरकीब लगाई थी जिसकी वजह से अकबर अपनी महानता को एक और कदम आगे बढ़ाने में सक्षम रहें ||

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अकबर बीरबल की कहानियां इन हिंदी

घमंड का आईना भाग - 1

एक बार की बात है जब बादशाह अकबर ने अपने से ज्यादा एक शक्तिशाली बादशाह से जंग  करने गए थे और जिस जंग में उन्हें सफलता मिलने के बाद अपने राज्य में बहुत ही धूमधाम से सभी बड़े और बूढ़ो की आशीर्वाद से एक नया अध्याय शुरू करने जा रहे थे |

बादशाह अकबर   एक महान राजा थे उनके दरबार में हर कोई खाली हाथ आता तो था लेकिन खाली हाथ जाता नहीं था अब पर हमेशा अपने दरबार में आए हर एक इंसान की अरदास सुनते थे अगर वह इंसान गरीब होता था तो उसकी झोली भर देते थे ||

अगर वह इंसान किसी मुसीबत में होता था तो उसकी मुसीबत को दूर करते थे और अगर कोई बीमार उनकी दरबार में अपनी बीमारी की अरदास लेकर आता था तो राजवैद्य द्वारा उसकी बीमारी को ठीक कर के उसे सकुशल अपने घर  भेज देते थे |

बादशाह अकबर अपने द्वारा किए हर एक काम की वजह से सभी की प्रशंसा के पात्र थे लेकिन यह प्रशंसा एक समय आने के बाद घमंड में परिवर्तन होना शुरू हो गया था क्योंकि बादशाह अकबर एक इंसान थे ||

और बादशाह अकबर के इस रूप को  लाने में बादशाह अकबर के राज्य के कुछ लोगों ने अकबर को बहुत ही बढ़ा चढ़ाकर कहना शुरू किया की बादशाह अकबर के जैसा दूसरा कोई नहीं है और बादशाह अकबर ही सब कुछ है बादशाह अकबर के बिना इस दुनिया में कुछ नहीं हो सकता ,

बादशाह अकबर को ऐसी बातों को सुनकर खुद को बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली राजा मानने लगे और कोई भी इंसान अगर मुसीबत में होता था तो  उसे भी मदद करते हैं लेकिन कुछ समय के बाद बादशाह अकबर के अंदर एक अलग ही तरह का घमंड विराज करने लगा |

एक समय आया बादशाह अकबर ने लोगों की मदद करना छोड़ दिया और उन्होंने सोचा कि अभी हर कोई अपना खुद के दम से खड़ा हो  सकता है और हमें किसी की जरूरत नहीं है हम अकेले ही खुद को संभाल सकते हैं ||

इसी घमंड में आकर बादशाह अकबर ने गरीबों की मदद करना छोड़ दिया था और जिसकी वजह से बादशाह अकबर को ऐसा लगने लगा था कि हर एक गरीब को मदद करना कोई बड़ी बात नहीं है कोई भी उनकी मदद कर सकता है और सभी को अकबर हल्के में लेने लगे || 

घमंड का आईना भाग - 2

बादशाह अकबर हर एक दिन अपना एक नया रूप दिखाते थे उनके मुताबिक एक इंसान खुद को सबसे ज्यादा शक्तिशाली तभी मान सकता है जब वह समाज के द्वारा बताए गए सभी प्रकार के कार्यों को संपादित करने में सक्षम हो

और अपनी एक अलग पहचान बना सके  तभी  समाज उसे हर रूप से सम्मानित करते हैं कमजोर ओके किसी भी प्रकार की जगह नहीं है ऐसी मनोभाव उनके मन में उत्पन्न होने लगे और जिसके पीछे सबसे बड़ा हाथ था राज दरबार के कुछ महा ज्ञानी लोग जो खुद को ज्ञानी पुरुष कहकर संबोधित करते थे

 कुछ दिनों बाद बादशाह अकबर ने ठीक किया कि वह फिर से गरीबों को खाना खिलाएंगे और इसीलिए उन्होंने सबसे पहले संत और पीर बाबा को सबसे पहले खाना खिला कर इस मुहिम की शुरुआत करने का सोचा

 बादशाह अकबर ने अपने राज्य के दूर-दूर रहने वाले सभी गरीब बाबा और संत महात्माओं को बुलाया और उन्हें अपने राज्य में रहने के लिए कहा और उन्हें हर रोज भोजन भी खिलाएंगे ऐसा वादा किया

 बादशाह अकबर चाहते थे कि वे अपने राज्य में हर प्रकार के लोगों को रखें और जिससे पूरे विश्व में उनकी ख्याति बढ़ते रहें और उनका सम्मान होता रहे इसी वजह से उन्होंने हर एक राज्य में पैगाम भिजवाया की हर एक राज्य से जितने भी संत महात्मा और  महापुरुष सभी आए और हमारे राज्य में रहे हम  उनकी सेवा करने का लाभ लेना चाहते हैं

 बादशाह अकबर की इस पैगाम को सुनकर राज्य में जंगल और दूर-दूर के गांव में रहने वाले हर एक महा ऋषि और पीर बाबा उनके राज्य में पधारे और उनके  द्वारा प्रदान की गई हर प्रकार की सेवाओं का लाभ उठाने लगे

ऐसा कुछ दिनों तक चलता रहा जब बादशाह अकबर ने देखा कि  उनके पैगाम भेजने की वजह से हर एक ऋषि और पीर बाबा उसके राज्य में रहने लगे

और उसके महल के हर एक कोने में अपना घर बना कर जीवन व्यतीत कर रहे थे जो बादशाह अकबर देखकर बहुत ही नाराज हो गए और उन्हें लगा कि सभी ऋषि मुनि हमेशा के लिए यहां पर अगर बस  गए तो उनकी महल की शोभा और राज्य की मर्यादा खतरे में आ जाएगी

1 दिन सुबह बादशाह अकबर अपने शयनकक्ष के खिड़की से देख रहे थे कि दो संत बादशाह अकबर के द्वारा बनाए एक दीवार के ऊपर बैठे हुए थे

बादशाह अकबर ने सोचा मेरा यह शाही दीवार जो मेरे महल को सुरक्षा प्रदान करता है ऐसे  संत उस दीवार  के ऊपर बैठकर उसकी सुंदरता और मर्यादा को हानि पहुंचा रहे हैं

 बादशाह अकबर के मन में उन दोस्तों के लिए घृणा उत्पन्न हो गई और बादशाह अकबर ने उसी वक्त एलान करवा दिया अगर कोई भी संत अथवा कोई भी ऋषि अथवा मुनि इस दीवार के ऊपर बैठा हुआ दिखाई दिया उसे मौत की सजा दी जाएगी

और उसी दिन जो दो संत उस दीवार पर बैठे हुए थे सैनिकों द्वारा उन दोनों संतो को वहां से उतारा गया और उन्हें तुरंत बादशाह कि राज्य को छोड़कर चले जाने के लिए आदेश दिया

घमंड का आईना भाग - 3

बादशाह अकबर के द्वारा दी गई आदेश को सुनकर दोनों संत बहुत ही दुखी हुई क्योंकि वह बादशाह अकबर ही थे जिन्होंने सभी संतो को अपने राज्य में ठहरने के लिए कहा |

और उनकी सेवा करने के लिए कहा अभी बादशाह खुद अपने द्वारा लागू किए गए पैगाम  की अवहेलना कर रहे हैं जो देखकर दोनों संतो को बहुत दुख हुआ उन्होंने सोचा अभी बादशाह अकबर को सिर्फ एक ही इंसान समझा सकता है ||

और उनके आंखों पर जो घमंड और लोगों के प्रति घृणा भाग का जो पट्टी लगा हुआ है उसे सिर्फ राजा  बीरबल ही निकाल सकते हैं दोनों संत ने राजा बीरबल के पास जाना सही समझा,

लेकिन सैनिकों द्वारा उन्हें आदेश दिया गया कि वह सुबह अस्त होने से पहले ही बादशाह अकबर के इस राज्य को छोड़कर चले जाए इसलिए उन्होंने देर न करते हुए  जल्द से जल्द राजा बीरबल से मिलना सही समझा |

दोनों संत निकल पड़े राजा बीरबल को मिलने राजा बीरबल के घर में जाने के बाद उन्होंने देखा कि राजा बीरबल खुद एक महा ऋषि की सेवा कर रहे हैं वह बहुत ही शक्तिशाली थे और राजा बीरबल उन महा ऋषि से बादशाह अकबर के लिए आशीर्वाद मांग रहे थे ||

तभी दोनों संतों ने जा के राजा बीरबल से कहा आप ऐसे एक इंसान के लिए इस महा ऋषि से आशीर्वाद मांग रहे हैं जो खुद किसी संत  की सम्मान नहीं करता है अपने ही राज्य में सभी संतो को बुलाकर उन्हें अपमानित करता है आप ऐसे एक बादशाह  के लिए कैसे आशीर्वाद मांग रहे हैं |

राजा बीरबल ने   दोनों संतो को उत्तर में कहा हो सकता है आपने राजा बीरबल का एक अलग ही रूप देख लिया है जो रूप बहुत ही दुर्लभ है क्योंकि बादशाह अकबर एक बहुत ही महान राजा है ||

वे खुद से पहले दूसरों की भला सोचते हैं हमेशा लोगों को खुश रखने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं और अपनी हर एक प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सभी प्रकार के दुश्मनों से लड़ते हैं |

राजा बीरबल को पता था कि राज्य के  कुछ लोग जो  बादशाह अकबर को पसंद नहीं करते थे और उनकी बुद्धि को भ्रष्ट करके  उनके द्वारा सभी संतो को अपमानित करवा रहे थे ||

बादशाह अकबर के आंखों में घमंड का पट्टी चल गया था और जिसकी वजह से वह हर एक संत जिनको उन्होंने पैगाम देकर बुलाया था सभी को  अपमानित करके अपने राज्य से निकाल रहे थे |

तभी राजा बीरबल ने बादशाह अकबर  के आंखों से घमंड की पट्टी को उतारने का सोचा और उन्हें सही मार्ग पर लाने के लिए एक नाटक रचाराजा बीरबल संत का भेष बनाकर उस दीवार में जाकर बैठ गए जो बादशाह अकबर का सबसे प्रिय दीवार था ||

बादशाह अकबर का उस दीवार का प्यारा होने का बस एक ही कारण था क्योंकि उनके शयन कक्ष के सामने उस दीवार को इस तरह से कार्यक्रमों ने बनाया था जो दिखने में बहुत ही मनमोहक था |

और जिस में  बैठकर पूरे राज्य को देखा जा सकता था उस दीवार के नीचे से एक सीढ़ी जाती थी जो दीवार में उठकर बैठने के लिए बनाया गया था और जिसका फायदा उठाकर दोनों संत कुछ देर के लिए उस दीवार के ऊपर बैठे थे ||

लेकिन बादशाह अकबर ने उन दोनों संत को बैठते देखकर बहुत ही क्रोध में उन्हें राज्य से बाहर चले जाने के लिए कह दिया था और इसी दीवार को माध्यम बनाकर  राजा बीरबल ने बादशाह अकबर का अहंकार तोड़ने का तय किया |

घमंड का आईना भाग - 4

राजा बीरबल ने अपने द्वारा एक भैंस बनाया जिसमें उन्होंने अपने एक ऐसे रूप को प्रदर्शित किया जो एक संत की तरह दिखता है  राजा बीरबल ने सर पर पगड़ी बड़ी-बड़ी  दाढ़ी और गाल पर एक बड़ा तिल लगाया और खुद को बहुत ही दूर से आया हुआ एक संत बता रहा था

 दोपहर का वक्त था जब सभी सैनिक और बादशाह अकबर  विश्राम कर रहे थे तभी राजा बीरबल ने बादशाह अकबर के उत्साही दीवार के ऊपर जाकर बैठना उचित समझा राजा बीरबल सभी सैनिकों के आंखों से झुकते हुए दीवार में चढ़कर बैठ गए और कुछ ही देर में जब सैनिकों ने आकर उस जगह को पहरा देने लगे तो वहां पर राजा बीरबल को एक संत के रूप में देखा और सैनिकों ने समझा कि यह एक बहुत ही प्रभावशाली और शक्तिशाली संत है 

 सैनिकों ने सबसे पहले संत को बहुत ही सम्मान पूर्वक इस राज दीवार से उतरकर चले जाने के लिए अनुरोध किया लेकिन राजा बीरबल जो संत बने हुए थे उन्होंने बहुत ही क्रोध से सैनिकों को मना कर दिया और कहा मैं बहुत ही दूर से आया हूं 

 मैं बहुत ही शक्तिशाली संत हूं मेरे मुंह से निकला हुआ हर एक वाणी सत्य हो जाता है मुझे क्रोध मत दिलाओ अगर मैं क्रोध में आ गया तो मैं तुम्हें कुछ ऐसी वाणी प्रदान करूंगा जो तुम्हारी जीवन को तहस-नहस कर देगा अगर तुम अपने खुद के जिंदगी से प्रेम करते हो तो तुम अभी के अभी मेरे सामने से चले जाओ

 सैनिक डर के मारे बादशाह अकबर के शयनकक्ष में जाकर खड़ा हो गया और बादशाह अकबर से कहने लगा कि एक बहुत ही प्रभावशाली  संत महात्मा आपके शाही दीवार के ऊपर बैठे हुए हैं 

बादशाह अकबर को लगा वह संत महात्मा बादशाह के द्वारा  शाही दीवार में लगाया गया  पैगाम को पढ़कर भी बादशाह  के आदेश का अपमान कर रहे हैं और इसी वजह से बादशाह अकबर को बहुत क्रोध आया और भी संत को राज्य से निकालने के लिए शाही दीवार के सामने चले गए  क्योंकि बादशाह अकबर को राज्य  का शाही दीवार बहुत ही प्रिय था और वह नहीं चाहते थे कोई भी बाहर का इंसान आकर उस चाहे दीवार में बैठे हैं इसीलिए उन्होंने उस महापुरुष को निकालने के  लिए एक सैनिक के टुकड़े लेकर संत के सामने जाकर उपस्थित  हो गए

 बादशाह अकबर ने संता से कहा – ” क्या आपने मेरे द्वारा लगाए इस पैगाम को नहीं पड़ा यह एक शाही दीवार है इस पर सिर्फ मेरा ही हक है और मैं किसी को इसमें बैठा हुआ नहीं  देख सकता ”

 ”अगर आपको आपकी  जीवन प्यारी है आप कृपया इस शाही दीवार से उतर जाइए और अपने राज्य में लौट जाइए यह मेरा हुकुम है’’

 तो भी राजा बीरबल जो संत बने हुए थे उन्होंने उत्तर में कहा ”  इसका क्या प्रमाण है कि यह राज्य तुम्हारा है और तुम इस शाही दीवार के मालिक हो तुम्हें इस राज्य का बादशाह ने बनाया और तुम्हें इस दीवार  के मालिक होने का प्रमाण मुझे दे दो मैं यहां से चला जाऊंगा’’

 राजा बीरबल ने बादशाह अकबर को यह राज्य ने किन से मिला उनके बारे में पूछा उत्तर में राजा बीरबल ने कहा ‘’ यह राज्य मुझे मेरे पूर्वजों से मिली है और मैंने अपनी शक्ति के दम पर इस राज्य को इतना शक्तिशाली और समृद्ध शाली बनाया इसलिए इस राज्य  का मैं बादशाह हूं’’

 ”राजा बीरबल जो संत बने हुए थे उन्होंने बादशाह को समझाया ‘’ देखिए बादशाह इस दुनिया में किसी का कुछ भी नहीं है हर एक चीज कुछ ही वक्त के लिए एक इंसान के पास रहता है फिर उसके मृत्यु के बाद वह चीज हमेशा के लिए उससे बिछड़ जाती है’’

”अगर आप सच में इस राज्य के प्रभावशाली राजा बनना चाहते हैं तो आप सभी लोगों में समान प्रेम और सद्भावना रखिए और हमेशा सभी की मदद कीजिए जिससे लोगों में आप के प्रति प्रेम और सम्मान दोनों बढ़ेगा”

”जिसकी वजह से आपके मरने के बाद भी आपकी ख्याति अमर रहेगी और अगर किसी इंसान का मरने के बाद भी चर्चा होता रहे तो उसे महापुरुष का दर्जा दिया जाता है”

”अगर आपको महापुरुष का दर्जा चाहिए तो आप हमेशा लोगों की मदद कीजिए और उन्हें हर एक मुसीबत और बीमारी से ठीक होने में उनकी मदद करें गरीबों की सहायता करें”

”और दुखी लोगों का कंधा बने  जिनसे आपको दुआएं मिलेंगी और आप इतिहास में हमेशा के लिए यादगार रहेंगे घमंड इंसान को छोटा बना देता है और आपके जैसा एक राजा इस प्रकार के अहंकार से और भी ज्यादा लोगों को ठेस पहुंचा रहा है जो आप के सम्मान और शान के खिलाफ है”

घमंड का आईना भाग - 5

संत की बातों को सुनने के बाद  बादशाह अकबर को अपने द्वारा हुए गलती का एहसास हुआ और अफसोस करने लगे कि उनके द्वारा बहुत ही बड़ा गलत काम हुआ है उन्होंने दो संत को राज्य से बाहर निकाल दिया है ||

और यह उन्होंने बहुत ही गलत किया है उन्होंने उसी वक्त अपने सैनिकों को राज्य के चारों ओर भेजा उन दोनों संत को ढूंढ कर लाने के लिएसंत की बात को सुनकर बादशाह अकबर ने खुद  के द्वारा हुए हर एक गलत काम  की वजह से सभी से माफी मांगा |

और फिर से हर एक इंसान की अच्छी तरह से मदद करने लगे और लोगों के दिलों में फिर से बच गया जितने भी लोग बादशाह अकबर के पैगाम से उनके राज्य में रहने आए थे सभी बहुत ही खुशी से रहने लगे और बादशाह अकबर ने उन्हें एक खुशहाल भरी जिंदगी देने का वादा किया और जिस  वादे को बादशाह अकबर ने निभाया ||

और इसी तरह राजा बीरबल ने बादशाह अकबर के आंखों में जो घमंड का आईना चढ़ा हुआ था उसे थोड़ा और बादशाह अकबर को हर एक प्रकार की बुरे काम करने से बचाया,

क्योंकि राजा बीरबल बादशाह अकबर के अच्छे सच्चे और खास दोस्त थे और  एक खास दोस्त हमेशा अपने खास दोस्त को कभी भी बुरे रास्ते में जाने नहीं दे सकता था और इसी का प्रमाण राजा बीरबल ने इस कहानी के माध्यम से सभी को प्रदान किया ||

 

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